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रविवार, 10 अप्रैल 2011

किस्मत

किस्मत के भरोसे कुछ हासिल नहीं होता   
परिश्रम और लगन का कोई विकल्प नहीं होता। असफलता को भूल जाना और उससे सबक लेकर आगे बढ़ना ही अच्छा होगा। सफल होने तक बढ़ते रहिए। निराश होकर या हारकर मत बैठिए। लक्ष्य आपसे अधिक दूर नहीं है। सफलता आपसे कुछ कदम ही दूर है। आप उसे देख रहे हैं तो उसे अपना बनाने से आपको कोई रोक नहीं सकता। सबसे बड़ी बात यह है कि सफलता और आपके बीच किस्मत नाम का कोई पड़ाव है ही नहीं!  
आज के वैज्ञानिक युग में सफलता और असफलता को किस्मत का खेल मानने वाले अंधविश्वासी लोगों की संख्या कम नहीं। भाग्य के भरोसे बैठने से कुछ हासिल होने वाला नहीं, यह बात जानते हुए भी अनगिनत लोग लकीर के फकीर बने रहते हैं। सफलता या असफलता उसे ही मिलती है जो उठकर योजना बनाकर चलने की कोशिश करता है। भाग्य या किस्मत के भरोसे बैठे रहकर सफलता की बाट जोहने वालों के कुछ हाथ नहीं आता। सफलता उसे ही मिलती है जो उसे पाने के लिए यथाशक्ति प्रयास करता है। सफलता के लिए पहले से ही आशंकित व्यक्ति को भला क्या मनचाही सफलता मिल सकती है! हर व्यक्ति की सफलता के पीछे उसके अपने प्रयास ही होते हैं। हां, किसी व्यक्ति को यूं ही सफलता मिल भी गयी हो तो यह मात्र संयोग ही हो सकता है जो कभी-कभार ही सम्भव है।
अच्छी और बुरी किस्मत का भ्रम अनगिनत लोगों को बैठेबिठाये असफल बना चुका है। अनेक युवाओं में प्रायः यह धारणा जड़ जमा लेती है कि किस्मत ने साथ दिया तो सफलता मिल ही जाएगी। चाहे जितना प्रयास कर लो, अगर किस्मत बुलन्द नहीं हुई तो कुछ होने वाला नहीं है। यानी किस्मत की शक्ति अपार है, यह मानने वालों की संख्या भी काफी है। इस प्रकार अपनी असफलताओं और कमियों का दोष बड़ी आसानी से औरों पर या किस्मत के मत्थे मढ़ा जा सकता है।
किस्मत के भरोसे रहने वाले युवा प्रायः औरों के लिए भी घातक हैं। वे अपनी निराशावादी प्रवृत्ति का जाने-अनजाने प्रसार ही करते हैं। लोगों में यह धारणा घर कर जाती है कि किस्मत से ही सफलता मिलेगी या जिन्हें सफलता मिलती है वे ही किस्मत के धनी होते हैं। परीक्षा हो या साक्षात्कार या फिर कोई अन्य कार्य, उसमें सफलता पाने के लिए उपयुक्त कार्ययोजना, लगन, समय का उचित प्रबन्धन, योग्यता, परिश्रम, समुचित प्रयास, दृढ़ निश्चय, संघर्ष, आत्मविश्वास आदि का महत्वपूर्ण योगदान होता है। आज के प्रतियोगिता के समय में किसी क्षेत्र विशेष में सफलता पा लेना थोड़ा कठिन अवश्य हुआ है पर असंभव नहीं। इस बात को ध्यान में रखते हुए अपना लक्ष्य तय करते समय उससे मिलते-जुलते और अपनी रूचि के विकल्प को भी ध्यान में रखना चाहिए।
इतिहास गवाह है कि आदमी को अपनी आवश्यकता और देखे गये सपनों को पूरा करने के लिए धुन के पक्के बनकर अनथक प्रयास करने के बाद ही सफलता मिली है। वह कभी सफल रहा और कभी असफल भी। असफलताओं ने आदमी को सिखाया भी। तब आदमी किस्मत के भरोसे बैठा रहता तो निश्चय ही आज भी हम उसी सदियों पुराने समय जैसी स्थिति में जी रहे होते। किसी व्यक्ति की सफलता उसके तमाम प्रयासों पर ही निर्भर करती है। यदि पर्याप्त प्रयासों के बाद भी असफलता मिलती है तो उसके पीछे अनेक कारण और कमियां हो सकती हैं। जिन पर ध्यान देकर पुनः प्रयास करके सफलता प्राप्त की जा सकती है।
अच्छा यही है कि काम आरम्भ करने से पहले उस पर भलीभांति विचार करना आवश्यक है। अपने कॅरियर या लक्ष्य के बारे में तय करने से पहले उससे मिलते-जुलते विकल्पों पर भी ध्यान देना चाहिए। निराशा या नकारात्मक सोच से उबरकर आशावादी या सकारात्मक सोच अपनाना बेहद जरूरी है। सफलता के प्रति सन्देह को स्थान नहीं मिलना चाहिए। यह याद रखना चाहिए कि किसी व्यक्ति को भी सफलता चुटकी बजाते नहीं मिल जाती। हर सफलता के पीछे उसे पाने के लिए ईमानदारी से किये गये प्रयास होते हैं। इसके लिए अपने कुछ छोटे-बड़े जरूरी-गैर जरूरी सुख भी त्यागने पड़ते हैं। सफलता एक दिन में नहीं मिल जाती, इसके पीछे होते हैं निरन्तर किये जाने वाले प्रयास। परिश्रम और लगन का कोई विकल्प नहीं होता। असफलता को भूल जाना और उससे सबक लेकर आगे बढ़ना ही अच्छा होगा। सफल होने तक बढ़ते रहिए। निराश होकर या हारकर मत बैठिए। लक्ष्य आपसे अधिक दूर नहीं है। सफलता आपसे कुछ कदम ही दूर है। आप उसे देख रहे हैं तो उसे अपना बनाने से आपको कोई रोक नहीं सकता। सबसे बड़ी बात यह है कि सफलता और आपके बीच किस्मत नाम का कोई पड़ाव है ही नहीं!        
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• टी.सी. चन्दर
प्रभासाक्षी में प्रकाशित 
शिकायत बोल- आपकी सब शिकायतों का मंच

शनिवार, 9 अप्रैल 2011

अन्ना हजारे

अन्ना हजारे और लोकपाल बिल 

• अन्ना हजारे कौन हैं?

सेवा-निवृत्त सैनिक जिन्होंने 1965 के युद्ध में हिस्सा लिया था। समाज सुधारक।
• तो इनमें क्या खास बात है?
इन्होंने महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के रालेगांव सिद्धि नामक गांव की काया पलट दी।
• तो क्या हुआ?
यह स्व-पोषित गांव के रूप में एक मॉडल है। यहाँ के सोलर पावर, बायोफ़्यूल तथा विंड मिल में गांव की जरूरत जितनी बिजली पैदा कर ली जाती है। 1975 में यह गांव बेहद गरीब था। आज यह देश के सर्वाधिक समृद्ध गांवों में से एक है। यह स्व-पोषित (सेल्फ सस्टेन्ड), पर्यावरण-प्रेमी तथा भाईचारा युक्त मॉडल गांव बन चुका है।
• ठीक है?
अन्ना हजारे को उनके सामाजिक कार्यों के लिए पद्म भूषण की उपाधि से नवाजा गया है।
• अच्छा तो वो किस लिए आंदोलन कर रहे हैं?
भारत में भ्रष्टाचार रोकने हेतु नया प्रभावी कानून पास करवाने के लिए।
• यह कैसे संभव है?
वे नए लोकपाल बिल की वकालत कर रहे हैं। यह बिल राजनीतिज्ञों (मंत्रियों), अफसरों (आईएएस/आईपीएस) इत्यादि को उनके भ्रष्ट कार्यों की सज़ा दिलाने में सक्षम होग।
• क्या ये एकदम नई चीज है?
1972 में तत्कालीन कानून मंत्री शांति भूषण ने यह बिल प्रस्तावित किया था। तब से राजनीतिज्ञ इसे दबाए बैठे हुए हैं और इसमें मनमाना संशोधन कर अपने अनुकूल बनाने में लगे हुए हैं।

• ओह.. तो वो सिर्फ एक बिल पास करवाने के लिए अनशन पर बैठे हैं. क्या ये इतने कम समय में संभव हो पाएगा?
पहली चीज जो वो चाह रहे हैं वो है कि सरकार घोषणा करे कि यह बिल जल्द पास होगा। उन्होंने महाराष्ट्र में सूचना का कानून ऐसे ही आंदोलन से लागू करवाया जिसे बाद में पूरे भारत में आरटीआई कानून के रूप में लागू किया गया। दूसरा, बिल के मसौदे के लिए सरकार एक कमेटी बनाए जिसमें जनता के प्रतिनिधि और सरकारी प्रतिनिधि बराबर हों। सरकारी अफसरों और राजनीतिज्ञों द्वारा बनाए गए बिल में अपने बचने के रास्ते और लूप होल्स निकाल ही लिए जाएंगे।
• बढ़िया. क्या होगा जब यह बिल पास हो जाएगा?लोकपाल की नियुक्ति केंद्र सरकार करेगी। वह इलेक्शन कमिश्नर की तरह ऑटोनोमस कार्य करेगा, किसी सरकारी संस्था के अधीन नहीं। हर राज्य में लोकपाल होगा. उसका काम सिर्फ यही होगा कि भ्रष्टाचार की रोकथाम करे और भ्रष्ट लोगों को 1-2 वर्ष के भीतर ट्रायल कर सजाएँ दे।
• अन्ना हजारे के साथ और कौन हैं?
भारत की पूरी जनता. बाबा रामदेव, किरण बेदी, अरविंद केजरीवाल, स्वामी अग्निवेश, आमिर खान...
• ठीक है, तो मैं क्या कर सकता हूँ?
इस संदेश को आगे भेजें. छापें, वीडियो में दें। अपने शहर में हो रहे इस आंदोलन के समर्थन में सभा, जुलूस में जाएँ. फेसबुक, जीमेल स्टेटस में इस आंदोलन को अपना समर्थन दर्ज करें। 
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