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गुरुवार, 10 जनवरी 2013

सरदार पटेल

आज फिर पटेल याद आ गये

डॉ विवेक आर्य








कासिम रिज़वी को ऑपरेशन पोलो के तहत गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया जहाँ वह 1957 तक सड़ता रहा। बाद में 1957 में वह माफ़ी मांग कर पाकिस्तान में शरणार्थी बनकर चला गया। 1947 से 1957 तक मजलिस पर प्रतिबन्ध रहा। इसी कासिम रिज़वी की मजलिस पार्टी को 1957 में अब्दुल वाहिद ओवैसी ने दोबारा से शुरू किया और वही अब्दुल वाहिद ओवैसी अकबरुद्दीन और असदुद्दीन का दादा था। 
`ओवैसी' नाम से चंद दिनों पहले तक शायद ही कोई हैदराबाद अथवा आंध्र प्रदेश के बाहर परिचित था। परन्तु आज सबको मालूम हो गया हैं कि ओवैसी के नाम से अकबरुद्दीन और असदुद्दीन दो भाई हैं जो मुस्लिम वोटों की खातिर इस देश के बहुसंख्यक हिंदुओं को सरेआम मिटाने की बात करते हैं जो हिन्दुओं के आराध्य प्रभु रामचन्द्र जी महाराज के विषय में अभद्र भाषा का प्रयोग करने से भी पीछे नहीं हटते हैं। पाठक सोच रहे होगे जिस अत्याचार की यह लोग बात कर रहे हैं वह कभी संभव ही नहीं हैं पर यह भी एक अटल सत्य है कि हिंदुओं का ‘इतिहास’ काफी कमज़ोर होता हैं। जी हाँ, मैं बात कर रहा हूँ 1947 से पहले के हैदराबाद स्टेट की जिस पर एक समय विश्व के सबसे अमीर आदमियों में से एक मतांध और संकीर्ण सोच वाला निज़ाम राज्य करता था। निज़ाम के राज्य में 95 प्रतिशत जनसँख्या हिन्दुओं की थी और मुसलमानों की संख्या केवल 5 प्रतिशत थी। उसके विपरीत राज्य की 95 प्रतिशत सरकारी नौकरियों पर मुसलमानों का कब्ज़ा था और केवल 5 प्रतिशत छोटी नौकरियों पर हिन्दुओं को अनुमति थी।
नेहरू-गांधी-पटेल
निज़ाम के राज्य में हिन्दुओं को किसी भी प्रकार से मुसलमान बनाने के लिए प्रेरित किया जाता था।  हिन्दू अपने त्यौहार बिना पुलिस की अनुमति के नहीं मना सकते थे। किसी भी मंदिर पर लाउड स्पीकर लगाने की अनुमति नहीं थी, किसी भी प्रकार का धार्मिक जुलूस निकालने की अनुमति नहीं थी क्यूंकि इससे पाँच वक्त के नमाज़ी मुसलमानों की नमाज़ में व्यवधान पड़ता था। हिन्दुओं को अखाड़े में कुश्ती तक लड़ने की अनुमति न थी। कारण स्पष्ट था की अगर हिन्दू बलशाली हो गए तो वे बल से इस अत्याचार का प्रतिरोध करेंगे। जो भी हिन्दू इस्लाम स्वीकार कर लेता तो उसे नौकरी/ छोकरी /जायदाद सब कुछ निज़ाम राज्य की और से दिया जाता था। तबलीगी का काम जोरों पर था और इस अत्याचार का विरोध करने वालों को पकड़ कर जेलों में ठूंस दिया जाता था जिनकी सज़ा एक अरबी पढ़ा हुआ क़ाज़ी शरियत के अनुसार सदा कुफ्र हरकत के रूप में करता था। जो भी कोई हिन्दू अख़बार अथवा साप्ताहिक पत्र के माध्यम से निज़ाम के अत्याचारों को हैदराबाद से बाहर अवगत कराने की कोशिश करता था तो उस पर छापा डाल कर उसकी प्रेस जब्त कर ली जाती, उसे जेल में डाल दिया जाता और मोटा हर्जाना वसूला जाना आम बात थी।
जब भारत की आबोहवा में पाकिस्तान का नाम लिया जाने लगा तो निज़ाम की मतान्धता में कई गुना की वृद्धि हुई और अपने अत्याचारों को मासूम प्रजा पर जिहादी तरीके से लागू करने के लिए उसने रजाकार के नाम से एक सेना बनाई जो हथियार लेकर गलियों में झुण्ड के झुण्ड बनाकर जिहादी नारे लगते हुए गश्त करने लगे। उनका मकसद केवल एक ही था। हिन्दू प्रजा पर दहशत के रूप में टूट पड़ना। इन रजाकारों का नेतृत्व कासिम रिज़वी नाम का एक मतान्ध मुसलमान कर रहा था। इन रजाकारों ने अनेक हिन्दुओं को बड़ी निर्दयता से हत्या की थी। हज़ारों अबलाओं का बलात्कार किया गया, हजारों निरपराध हिन्दू बच्चों को पकड़ कर सुन्नत तक कर दिया था । यहाँ तक की जनसँख्या का संतुलन बिगाड़ने के लिए बाहर से लाकर मुसलमानों को बसाया गया था।
आर्य समाज के हैदराबाद के प्रसिद्द नेता भाई श्यामलाल वकील की जेल में डालकर अमानवीय अत्याचार कर जहर द्वारा हत्या कर दी गयी। MIM - Majlis-e-Ittehād-ul Muslimīn (माजलिस-ए-इत्तेहाद-उल-मुसलमिन) की स्थापना 1927 में निज़ाम की सलाह पर उसके कुछ बाशिंदों ने करी थी जिसकी कमान बाद में कासिम रिज़वी के हाथ में आ गयी थी। आर्य समाज ने 1939 में इस हिंदुओ पर हो रहे अत्याचार के विरुद्ध अहिंसात्मक आन्दोलन किया। पूरे भारत से 7.5 हज़ार आर्य क्रांतिकारियों ने निज़ाम की जेलों को भर दिया जिससे की निज़ाम के राज्य में किसी अपराधी को जेल में रखने का स्थान न बचा। अहिंसा का मंत्र जपने वाले महात्मा गाँधी ने आर्यसमाज का खुलकर हैदराबाद सत्याग्रह करने पर विरोध किया जिसकी प्रतिक्रिया स्वरुप कांग्रेस का दफ्तर उसके सभी सदस्यों के त्याग पत्रों से भर गया तब जाकर गाँधी को मालूम हुआ की कांग्रेस के 85% सदस्य आर्य समाजी हैं और उन्होंने अपनी आलोचना को वापिस लिया। आर्यसमाज के इस सत्याग्रह में दो दर्जन के करीब सत्याग्रही शहीद हुए पर अंत में विजयश्री आर्यसमाज को ही मिली। निज़ाम जो दुनिया में अपने से बढ़कर किसी को भी नहीं समझता था उसे नीचा दिखा दिया गया। मजलिस ने आर्यसमाज का पुरजोर विरोध किया पर विजय अंत में सत्य की हुई। हिन्दुओं को उनके अधिकार मिले। पर आन्दोलन के बाद भी रजाकारों का अत्याचार न थमा।  
1947 तक आते आते निज़ाम ने पाकिस्तान से हैदराबाद रियासत को मिलाने की बात कह दी और एक 15 मील चोड़ा कॉरिडोर हैदराबाद को पाकिस्तान से जोड़ने के लिए माँगा। कासिम रिज़वी सरदार पटेल को धमकी देने की नीयत से दिल्ली आया और सरदार पटेल से बोला कि अगर निज़ाम की मांगों को न माना गया तो उसके राज्य में रह रहे 6 करोड़ हिंदुओं की खैर नहीं होगी। सरदार पटेल ने मुस्कुराते हुए रिज़वी को कहा कि  अगर हिंदुओ को कुछ भी हुआ तो निज़ाम और खुद कासिम रिज़वी अपने बच्चों की खैरियत मनाये। सरदार पटेल का कड़ा रुख देखकर रिज़वी वापिस हैदराबाद भाग गया।
अब्दुल वाहिद ओवैसी
नेहरु हैदराबाद के मामले को UNO में लेकर जाने की बात कर रहे थे जबकि सरदार पटेल हैदराबाद पर सैनिक कार्यवाही का मन बना चुके थे। रजाकारों द्वारा यह खबर उड़ाई जा रही थी की हजारों की संख्या में हथियार, गोला बारुद निज़ाम ने पाकिस्तान से भारत की फौजों से लड़ने के लिए मंगवाया हैं। सरदार पटेल अपने निश्चय पर अटल रहे क्यूंकि उन्हें मालूम था की अपने ही बच्चे पाकिस्तान की कितनी औकात हैं।  उन्होंने हैदराबाद को भारत में मिलाने के लिए जैसे ही कार्यवाही शुरू करी तो अधिकांश रजाकारों ने आत्म समर्पण कर दिया और कुछ मार डाले गये। दुनिया का सबसे घमंडी आदमी निज़ाम अपना-सा मुँह लेकर रह गया और समझोते के लिए सरदार पटेल की अगवानी करने स्वयं हवाई अड्डे पर पहुंचा। सरदार पटेल ने अपनी शर्तों पर निज़ाम से संधि करवाई। कासिम रिज़वी को ऑपरेशन पोलो के तहत गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया जहाँ वह 1957 तक सड़ता रहा। बाद में 1957 में वह माफ़ी मांग कर पाकिस्तान में शरणार्थी बनकर चला गया।
1947 से 1957 तक मजलिस पर प्रतिबन्ध रहा। इसी कासिम रिज़वी की मजलिस पार्टी को 1957 में अब्दुल वाहिद ओवैसी ने दोबारा से शुरू किया और वही अब्दुल वाहिद ओवैसी अकबरुद्दीन और असदुद्दीन का दादा था। पाठक अब यह आसानी से जान गए होगे की किस प्रकार इनकी पार्टी मजलिस ने पहले हिंदुयों पर अत्याचार किया उसके बाद पाकिस्तान के समर्थन में नारे लगाये, और अब भारत में जिहादी गतिविधियों और दंगे फसाद को फैलाने की इनकी मंशा हैं। इनका एक ही हल हैं की इन दोनों भाइयों को कासिम रिज़वी की तरह पकड़ कर या तो जेल में डाल देना चाहिए अथवा पाकिस्तान भेज देना चाहिए और इनकी पार्टी पर राष्ट्र द्रोही गतिविधियों के कारण प्रतिबन्ध लगा देना चाहिए। यह कार्य अगर कोई कर सकता हैं तो केवल सरदार पटेल कर सकते हैं और इसीलिए आज फिर पटेल याद आ गये।
साभार
link: http://agniveerfans.wordpress.com/2013/01/10/sardar-patel/
http://www.youtube.com/watch?feature=player_embedded&v=Dje382DaAag

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