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सोमवार, 28 जनवरी 2013

बैण्ड

अपना ‘बैण्ड’ बजाएं
अंग्रेजों की सेना जब भारत में आयी तो उनके ब्रास बैण्ड भी साथ में आये। उनको भारत के राजाओं पर हमला करना होता था तब उनका ब्रास बैण्ड बजता रहता था। बाद में जब अंग्रेज गये तो वह ब्रास बैण्ड को यहीं छोड़ गये और हमने उसको बजाना शुरू कर दिया शादी, बारातों और अनेक शुभ अवसरों पर। वैदिक और दूसरी पद्धतियों में होने वाले विवाह में जो पश्चिम की नक़ल है वह है ब्रास बैण्ड बजाकर बारात लेकर जाना।
यह पूरी की पूरी अंग्रेजों की नक़ल है। यूरोप में यह परंपरा है, खासकर इंग्लैण्ड, आयरलैण्ड, स्कॉट्लैण्ड में। यह ब्रास और बैण्ड तब बजाया जाता है जब दुश्मन पर हमला करने के लिए जाया जाता है और सेना के आगे-आगे चल कर जाते हैं ताकि सेना में जोश भरे, उत्साह भरे और दुश्मन पर जाके टूट पड़े, हमला करे। यहाँ मूर्ख भारतवासी शादियों में बारात में वो ब्रास बैण्ड लेकर जाते हैं। पता नहीं किस दुश्मन पर हमला करने जा रहे हैं!
भारत में हर शुभ अवसर पर या काम में शहनाई बजती है तो शहनाई बजाइए, बांसुरी बजाइए पर बेसुरा ब्रास बैण्ड बजाना बन्द करिए।
दिये गए लिंक पर जाकर वीडियो देखे : http://www.youtube.com/watch?v=MWL8_wGCbMQ

शनिवार, 26 जनवरी 2013

कबीरवाणी

भारती बंधु: कबीर को गाते हैं पांच भाई 
लोक कलाकारों से समृध्द छत्तीसगढ़ की पहचान देश-दुनिया में पंडवानी की मशहूर गायिका तीजनबाई के कारण तो है ही, भारती बंधुओं ने भी कबीर की रचनाओं को भजन में ढालकर एक अलग पहचान कायम कर ली है। भारती बंधु- अर्थात् पांच भाई एक साथ-एक स्वर में एक मंच पर बैठकर जब कबीर को गाते हैं तो श्रोता मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। सबसे बड़े भाई स्वामी जीसीडी भारती वैसे तो रायपुर नगर निगम में सरकारी नौकरी में हैं, लेकिन दफ्तर के बाद उनका पूरा समय रियाज में ही बीतता है। उनका पूरा परिवार कबीरमय है। 'कबीर ही क्यों?' पूछने पर स्वामी भारती कहते हैं कि आज के दौर में कबीर ही सबसे ज्यादा मौजूं लगते हैं। चारों तरफ धर्म और जातीयता के विषाद हैं, ऊंच-नीच भेदभाव के माहौल में कबीर के दोहे ही रास्ता बता सकते हैं।
अशोक वाजपेयी ने तो यहां तक कहा था कि कबीर की मस्ती और फक्कड़पन के बिना सच्चा गायन संभव नहीं। सचमुच भारती बंधुओं को देखकर अलमस्त फकीर याद आ जाते हैं। तन पर सफेद कुरता और लुंगी, सिर पर हिमाचली टोपी सादगी के साथ जब स्वर लहरियां जुड़ती हैं तो माहौल कबीरमय हो उठता है। जैसे गाते हैं, वैसे ही रहते हैं भारती बंधु। रायपुर में मारवाड़ी श्मशान घाट के ठीक सामने उनका निवास है। जीसीडी भारती से छोटे विवेकानंद तबले पर संगत देते हैं। अनादि ईश्वर सहगायक हैं। अरविंदानंद मंजीरा बजाते हैं और सत्यानंद ढोलक संभालते हैं। भारती बंधु रचना का चयन सधे हुए तरीके से करते हैं। स्वामी जीसीडी भारती मंच पर तान छेड़ते हैं- कबीरा सोई पीर है जो जाने पर परी, जो पर पीर न जानई वो काफिर बेपीर। तो श्रोता मगन हो जाते हैं। फिर धीरे-धीरे श्रोता कबीर में डूबते चले जाते हैं। भारती बंधुओं को अभी तक कोई बडा पुरस्कार नहीं मिला है। वे कहते हैं- हमें बड़े-बड़े बुध्दिजीवी आशीर्वाद देते हैं और हजारों श्रोता कबीर को सुनकर परमानंद प्राप्त करते हैं, यही हमारा सबसे बड़ा पुरस्कार है। हम लोग जिंदगी भर कबीर को गाते रहेंगे। हम लोग रीमिक्स या पाप (पॉप) नहीं गाना चाहते हैं, कबीर को गाना ही पुण्य कमाना है। भारती बंधुओं की शैली में कव्वाली का रस है। हारमोनियम, तबला, ढोलक जैसे पारंपरिक वाद्ययंत्रों के साथ वे तीन घंटे रोज रियाज करते हैं।













कबीर कहते हैं- ''राम-रहीमा एक है, नाम धराई दोई। आपस में दोऊ लरि-लरि मुए, मरम न जाने कोई॥'' कबीर की सभी रचनाओं में समाज के लिए कोई न कोई शिक्षा जरूर है और आज सैकड़ों सालों बाद भी कबीर का महत्व कम नहीं हुआ है। इसीलिए हमने कबीर को अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया है। माता सत्यभामा और पिता स्वामी विद्याधर गैना भारती से सभी भारती बंधुओं को प्रेरणा मिली। दरअसल भारती बंधु परिवार में की पीढ़ियों से भजन गायकी की परंपरा रही है जिसे सहेजने और संगठित करने की प्रेरणा स्वामी जीसीडी भारती ने ग्रहण की और आज वे प्राय: सभी बड़े आयोजनों में शिरकत करने लगे हैं। दिल्ली में त्रिवेणी कला सभागार हो या एनसीईआरटी का कार्यक्रम, भारती बंधु हमेशा बुलाये और सुने जाते हैं। भारती बंधुओं का अंदाजेबयां भी गजब है। उनकी महफिल की शुरुआत अंचल के जाने माने व्यंग्यकार गिरीश पंकज की इन लाइनों से होती है- ''गिरती है दीवार धीरे-धीरे, जोर लगाओ यार धीरे-धीरे, मिलने-जुलने में कसर न छोड़ना, हो जाएगा प्यार धीरे-धीरे।'' वैसे कबीर को गाते हुए भारती बंधु इन पंक्तियों का जिक्र जरूर करते हैं- ''हद छांड़ी बेहद गया, रहा निरंतरहोय, बेहद के मैदान में रहा कबीरा सोय।' छत्तीसगढ़ के भारती बंधुओं को 18 जिलों में कबीर गायन के लिए अनुबंधित किया गया था। अब तक वे हजारों कार्यक्रम दे चुके हैं। इनकी अद्भुत कबीरशैली से प्रसन्न होकर मशहूर आलोचक डॉ. नामवर सिंह भी उनकी तारीफ कर चुके हैं।
• रमेश शर्मा

सौजन्य: लिन्क- यायावर 
भारती बंधुओं को हार्दिक बधाई
पद्मश्री पुरस्कारों के लिए जिन ८० शख्सियतों का चयन किया गया है उनमें कला क्षेत्र से छत्तीसगढ़ के स्वामी जीसीडी भारती उर्फ भारती बंधु छत्तीसगढ़ के प्रख्यात कबीर सुफियाना लोकगायक हैं। आपको हार्दिक बधाई! लोक कलाकारों से समृध्द छत्तीसगढ़ की पहचान देश-दुनिया में पंडवानी की मशहूर गायिका तीजनबाई के कारण तो है ही, भारती बंधुओं ने भी कबीर की रचनाओं को भजन में ढालकर एक अलग पहचान कायम कर ली है।
भारती बंधु- अर्थात् पांच भाई, एक साथ-एक स्वर में, एक मंच पर बैठकर जब कबीर को गाते हैं तो श्रोता मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। सबसे बड़े भाई स्वामी जीसीडी भारती वैसे तो रायपुर नगर निगम में सरकारी नौकरी में हैं, लेकिन दफ्तर के बाद उनका पूरा समय रियाज़ में ही बीतता है। उनका पूरा परिवार कबीरमय है। 'कबीर ही क्यों?' पूछने पर स्वामी भारती कहते हैं कि आज के दौर में कबीर ही सबसे ज्यादा मौजूं लगते हैं। चारों तरफ धर्म और जातीयता के विषाद हैं, ऊंच-नीच भेदभाव के माहौल में कबीर के दोहे ही रास्ता बता सकते हैं। कबीर कहते हैं- ''राम-रहीमा एक है, नाम धराई दोई। आपस में दोऊ लरि-लरि मुए, मरम न जाने कोई॥'' कबीर की सभी रचनाओं में समाज के लिए कोई न कोई शिक्षा जरूर है और आज सैकड़ों सालों बाद भी कबीर का महत्व कम नहीं हुआ है। इसीलिए हमने कबीर को अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया है। http://sharmaramesh.blogspot.in/2009/05/blog-post_1527.html

शुक्रवार, 18 जनवरी 2013

जय हिन्द

जय जवान-जय किसान

शनिवार, 12 जनवरी 2013

विवेकानन्द जयती

मेवाड़ संस्थान  में मनायी गयी 
स्वामी विवेकानन्द की १५०वीं जयती








वसुन्धरा (गाजियाबाद) स्थित मेवाड़ संस्थान के मेवाड़ ऑडिटोरियम में स्वामी विवेकानन्द  की १५०वीं जयंती  १२ जनवरी २०१३ को बड़े धूम धाम से मनायी गयी।
इस अवसर पर स्वामी निखिलानन्द सरस्वती (चिनमय मिशन) और डा. अश्वनी महाजन (डी.ए,वी. कॉलेज,  दिल्ली विश्व विद्यालय), मुख्य अतिथि के रूप में विद्यमान थे। दीप प्रज्ज्वलन, स्वागत अभिवादन, वन्दे मातरम् एवं सरस्वती वंदना के साथ कार्यक्रम का शुभारम्भ हुआ।
संस्थान के विभिन्न छात्र-छात्राओं ने अनेकानेक प्रकार से स्वामी जी के जीवन एवं उनके कार्यों तथा शिक्षाओं पर प्रकाश डालने का प्रयास किया। इस संदर्भ में संस्थान के छात्र-छात्राओं ने स्वामी जी के जीवन पर एक नाटक का मंचन भी किया। इस अवसर पर स्वामी जी द्वारा दी गयी सूक्तियों एवं निबन्ध प्रतियोगिता का आयोजन भी किया गया। निबन्ध प्रतियोगिता में अजय कुमार शिक्षा विभाग को प्रथम, आकांक्षा शर्मा, एम.एस.सी. बायोटेक को द्वितीय, वरूण कुमार कम्प्यूटर विभाग को तृतीय, दीप्ति गुप्ता एल.एल.बी. ५ वर्षीय को चेयरमैन अवार्ड प्रदान किया गया। सूक्ति प्रतियोगिता में केशव बी.बी.ए. प्रथम, आकांक्षा, एम.एस.सी. बायोटेक द्वितीय एवं जे.ई.जया एल.एल.बी. ५ वर्षीय को तृतीय पुरस्कार दिया गया। इस अवसर पर प्रतियोगिता में सहभागी सभी छात्र-छात्राओं को नगद पुरस्कार प्रदान किये गये।
मुख्य अतिथि स्वामी निखिलानंद सरस्वती जी ने सभी छात्र-छात्राओं को संबोधित करते हुए कहा कि आज इस अवसर पर विवेक को प्रखर करने की जरूरत है। सही सोच सकारात्मक बुद्धि और निर्णय लेने की क्षमता हमें विवेकानन्द जी से सीखने को मिलती है। आज जरूरत है स्वंय को समझने की। इस सम्बन्ध में उन्होंने अनेक उदाहरण देकर समझाने का प्रयास किया।
कार्यक्रम का समापन करते हुए संस्थान के अध्यक्ष श्री अशोक कुमार गादिया ने स्वामी विवेकानन्द के जीवन से सम्बन्धित शिक्षाओं का वर्णन करते हुए कहा कि तुममें से ही किसी को विवेकानन्द बनना है। उन्होंने श्री रामकृष्ण परमहंस एवं नरेन्द्र से विवेकानन्द बनने की  घटनाओं का वर्णन किया। अध्यक्ष ने स्वामी विवेकानन्द द्वारा मद्रास में दिये गये उनके भाषण को भी पढ़कर सुनाया और कहा कि इस अंश को सभी छात्र-छात्राओं को पढ़ना चाहिए। इसमें देश-प्रेम मानव सेवा कूट-कूटकर भरी है। जिस धर्म को साधु-संन्यासियों का धर्म कहा जाता था उसी धर्म का विवेकानन्द ने विश्व में परचम फहराया। आज जरूरत है उनके विचारों को समाज में लागू करने की।
विचार गोष्ठी 
स्वामी विवेकानन्द की १५०वीं जयंती के स्मरणोत्सव पर एक विचार गोष्ठी का आयोजन भी सायं 4 बजे किया गया। प्राथमिक औपचारिकताओं के बाद विचार गोष्ठी का शुभारम्भ करते हुए मुख्य अतिथि प्रतिष्ठित साहित्यकार एवं वक्ता प्रो. नरेन्द्र कोहली ने स्वामी विवेकानन्द के जीवन, वैराग्य, धर्म, विज्ञान, योग, वेदान्त, मीमांसा एवं दर्शन का विस्तृत वर्णन करते हुए कहा कि विवेकानन्द निश्चित रूप से उच्चकोटि के सन्त थे। उनकी सोच वैज्ञानिक सोच रही है, जिसकी आज के समय में नितान्त जरूरत है। प्रो. कोहली ने विचार गोष्ठी के दौरान धर्म, अध्यात्मिकता, योग, वेदान्त एवं दर्शन जैसे विषयों पर प्रश्नोत्तर के माध्यम से श्रोताओं की शंकाओं का समाधान भी किया।
कार्यक्रम के अन्त में संस्थान के अध्यक्ष श्री अशोक कुमार गादिया ने कहा कि ऐसी विचार गोष्ठियाँ समय-समय पर होती रहनी चाहिए। उन्होंने कहा कि विवेकानन्द जैसे राष्ट्र सन्त की १५०वीं जयंती के अवसर पर इस विचार गोष्ठी की आवश्यकता और बढ़ जाती है। उन्होने कार्यक्रम में पधारे सभी लोगों को हार्दिक धन्यवाद दिया।
इस अवसर पर संस्थान के सभी छात्र-छात्राएं, अध्यापक, निदेशक डा. अलका अग्रवाल, डायरेक्टर जनरल ऑफ लॉ भारत भूषण एवं अनेक बुद्धिजीवी उपस्थित थे। कार्यक्रम का सफल संचालन शिक्षा विभाग की प्रवक्ता सुश्री तानिया गुप्ता और श्री बाबू लाल ने किया।
प्रस्तुति: टी.सी. चन्दर

साई

साई बोल मूरख
हाल ही में हमारे क्षेत्र में एक जुलूस निकला- अंग्रेजी बैण्ड बाजों के साथ। आगे एक वाहन में गणेशजी की प्रतिमा, उसके पीछे साई बोल कहती ज्यादा महिलाएं-लड़कियां और कुछ पुरुष फ़िर साई बाबा की प्रतिमा। ऐसे द्रूश्य तमाम बस्तियों में साई के व्यवसाय के प्रचार के रूप में दिखाई दे जाते हैं। यहीं अक्सर ऐसे छोटे-बड़े जुलूस निकलते रहते हैं। हिन्दू धन्य होते हैं कि उन्हें एक और संकटमोचक (?) मिल गया। कारण, साई को राम, कृष्ण, विष्णु, शिव आदि देवताओं के साथ नत्थी कर दिया गया है, जैसे- ॐ साई राम।  इस आशय के तमाम चित्र नेट पर मौजूद हैं। साई महिमा की तमाम कहानियां प्रचलित की गई हैं। कुछ टीवी चैनल भी इस धन्धे में शामिल हैं। फ़िल्म-डॉल्यूमेण्टरी बन गयीं। तमाम ब्लॉग-वेबसाइटें मौजूद हैं। फ़ुटपाथ-जमीनों पर कब्जजा कर उसके मन्दिर बनाए जा रहे हैं। यही नहीं लालची लोग हिन्दू मन्दिरों में साई की मूर्तियां स्थापित कर लोगों की अन्ध श्रद्धा से धन्धा बढ़ाने में लगे हुए हैं। साई की मूर्ति मन्दिर में होन एक फ़ैशन का रूप ले चुका है। सनातन धर्म के भजन-कीर्तनों में साई भजन की फ़रमाइश भी उठती है। जमकर महिमामण्डन हो रहा है। मूर्ख बनाया जा रहा है और हम खुशी-खुशी बन भी रहे हैं।















शिरडी के साई
साभार/लिन्क: https://hindurashtra.wordpress.com/2012/04/12/shirdi-sai-baba/
संत वही होता है जो लोगो को भगवान से जोड़े , संत वो होता है जो जनता को भक्तिमार्ग की और ले जाये , संत वो होता है जो समाज मे व्याप्त बुराइयों को दूर करने के लिए पहल कर इस साई नाम के मुस्लिम पाखंडी फकीर ने जीवन भर तुम्हारे राम या कृष्ण का नाम तक नहीं लिया और तुम इस साई की काल्पनिक महिमा की कहानियों को पढ़कर इसे भगवान मान रहे हो। कितनी भयावह मूर्खता है ये! महान ज्ञानी ऋषि-मुनियो के वंशज आज इतने मूर्ख और कलुषित बुद्धि के हो गए हैं कि उन्हें भगवान और एक साधारण से मुस्लिम फकीर में फर्क नज़र नहीं आता ? जब आज तक कभी कोई मुस्लिम तुम्हारे शिवलिंग पर दूध या जल चढ़ाने नहीं आया, कभी तुम्हारे हनुमान जी की मूर्ति पर सिंदूर चढ़ाने नहीं आया, कभी तुम्हारे विष्णु जी पर तुलसी-दल या असंख्यों मंदिरो में स्थापित मूर्तियों पर पुष्प चढ़ाने नहीं आया तो तुम किस मुंह से सडी़ हुयी लाशों के ऊपर बनी कब्रों,दरगाहों और मजारों पर चादर चढ़ाने पहुच जाते हो? शरम नहीं आती। वो तुम्हारे भगवान को गालिया देते है, निंदा करते है और दिन मे एक दो नहीं पाँच पाँच बार मस्जिद से साफ साफ चिल्लाते हैं कि एकमात्र ईश्वर अल्लाह है और कोई है ही नहीं। तो तुम्हें सुनाई नहीं देता क्या। या फिर तुम्हारी ऐसी कौन सी इच्छा है जो कि हमारे परमकृपालु, दयालु ,भक्तवत्सल भगवान पूरी कर ही नहीं सकते, उसे या तो सड़े हुये मुर्दे की हड्डिया पूरा कर सकती है, या फिर शिरडी मे जन्मा एक मुस्लिम फकीर साई! आखिर जाते क्यों हो? जब तुम्हारी प्यास भगवान रूपी गंगाजल से नहीं बुझ रही तो दरगाह और साई रूपी कुंए के पानी से कैसे बुझ जाएगी? गंगाजल को छोडकर कीचड़ की ओर भागने वाले कितने महामूर्ख होते हैं इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इन अंधभक्तों को दुनिया भर के तर्क, तथ्य, प्रमाण तक दे दिये, यहा तक कि श्री कृष्ण भगवान द्वारा गीता में इसी विषय पर कहा गया एक श्लोक तक दिखा दिया पर इन धूर्तों की बुद्धि , कलयुग के पाप ने इतनी कुंठित और प्रदूषित कर दी है कि इन्हे समझ ही नहीं आता। गीता में श्री कृष्ण भगवान जी ने साफ साफ कहा है कि जो जिसे पूजता है वो उसे ही प्राप्त होता है यानि मरे हुये व्यक्तियों को सकाम भाव से पूजने वाला पिशाच योनि को प्राप्त होता है। ये स्वयं श्री कृष्ण ने कहा तो भी इन मूर्खो मे इतनी भी बुद्धि नहीं बची कि समझ जायें कि साई को पूजने वाले मृत्युपर्यंत पिशाच बनकर ही भटकेंगे।
तुम चाहे कितना भी साई-साई चिल्लाओ गला फाड़ फाड़ के, चाहे दरगाहों पर जाकर कितनी भी चादर चढालो, तुम श्री भगवान को तो क्या उनकी कृपा का एक अंश भी प्राप्त नहीं कर सकते। ये सत्य है साई ने ऐसा क्या कर दिया था जो तुम्हारा गला नहीं दुखता उसकी महिमा गाते गाते? अरे पूरा भारत उस समय अंग्रेज़ों के डंडे खा रहा था, साई ने बचाया था क्या? अगर वो भगवान था या संत था तो उसने गुलामी की बेड़ियों में जकड़ी भारत माता को स्वतन्त्रता दिलाने के लिए क्या किया था? उस समय श्री कृष्ण की प्रिय सर्वदेवमई गोमाताएं काटी जाती थीं उनके ऊपर साई कभी क्यों नहीं बोला? भगवान श्री कृष्ण थे, जब कंस के अनुचर गोमाताओ को ले जाने लगे तो, उन्हें मार कर परलोक पहुंचा दिया था और एक ये साई था कि हजारों गोमाताएं रोज कटती रहीं ये बचाना तो दूर उनके ऊपर कभी बोला तक नहीं? काहे का भगवान या संत था ये ? क्या इस भूमि की सनातनी संतानें इतनी बुद्धिहीन हो गयी हैं कि जिसकी भी काल्पनिक महिमा के गपोड़े सुन ले उसी को भगवान और महान मानकर भेडॉ की तरह उसके पीछे चल देती है? इसमे हमारा नहीं आपका ही फायदा है।  श्रद्धा और अंधश्रद्धा में फर्क होता है, श्रद्धालु बनो, भगवान को चुनो, राम और कृष्ण के बनो, साई के बनाकर सिर्फ भूत प्रेत बनाकर ही भटकोगे ….. जय श्री राम कृष्ण ……… जय सनातन धर्म
साई भक्तों के लिए दस प्रश्न – अगर किसी भी साई भक्त के पास इन दस प्रश्नो का उत्तर हैं तो में भी साई का भक्त बनूँगा और उत्तर नहीं है तो कृपया मेरी फ्रेंड लिस्ट से विदा लेले, सचिन शर्मा को ऐसे मित्रो की आवश्यकता नहीं है चाहे कोई भी हो कोई फालतू की बहस नहीं, कुतर्क नहीं, जिसके पास सभी प्रश्नो का सार्थक जवाब हो उत्तर दे। कोई सुझाव नहीं चाहिए और अगर इनके उत्तर नहीं है या इन्हे पढ़ने के बाद शर्म आए तो भगवान की और बढ़ो, कल्याण होग।
1 – साई को अगर ईश्वर मान बैठे हो अथवा ईश्वर का अवतार मान बैठे हो तो क्यों? आप हिन्दू हैं तो सनातन संस्कृति के किसी भी धर्मग्रंथ में साई महाराज का नाम तक नहीं है। तो धर्मग्रंथों को झूठा साबित करते हुए किस आधार पर साई को भगवान मान लिया? और धर्मग्रंथ कहते हैं कि कलयुग में दो अवतार होने है एक भगवान बुद्ध का हो चुका दूसरा कल्कि नाम से अंतिम चरण में होगा।
2 – अगर साई को संत मानकर पूजा करते हो तो क्यों? क्या जो सिर्फ अच्छा उपदेश दे दे या कुछ चमत्कार दिखा दे वो संत हो जाता है? साई महाराज कभी गोहत्या पर बोले? साई महाराज ने उस समय उपस्थित कौन सी सामाजिक बुराई को खत्म किया या करने का प्रयास किया? ये तो संत का सबसे बड़ा कर्तव्य होता है और फिर संत ही पूजने हैं तो कमी थी क्या ? यह फकीर ही मिला ?
3- अगर सिर्फ दूसरों से सुनकर साई के भक्त बन गए हो तो क्यों? क्या अपने धर्मग्रंथो पर या अपने भगवान पर विश्वास नहीं रहा ?
4 – अगर मनोकामना पूर्ति के लिए साई के भक्त बन गए हो तो तुम्हारी कौन सी ऐसी मनोकामना है जो कि भगत्वतसल भगवान शिवजी या श्री विष्णु जी या कृष्ण जी या राम जी पूरी नहीं कर सकते सिर्फ साई ही कर सकता है? तुम्हारी ऐसी कौन सी मनोकामना है जो कि वैष्णो देवी या हरिद्वार या वृन्दावन या काशी या बाला जी में शीश झुकाने से पूर्ण नहीं होगी वो सिर्फ शिरडी जाकर माथा टेकने से ही पूरी होगी।
5 – तुम्हारे पूर्वज सुबह और शाम श्री राम या कृष्ण या शिव शिव ही बोलते थे फिर तुम क्यों सिर्फ प्रचार को सुनकर बुद्धि को भ्रम में डालकर साई-साई चिल्लाने लगे हो?
6 – अगर भगवान कि पूजा करनी है तो इतने प्यारे,दयालु ,कृपालु भगवान है न तुम्हारे पास फिर साई क्यों ? अगर संतों की पूजा करनी है तो साई से महान ऋषि मुनि हैं न साई ही क्यों?
7 -मुस्लिम अपने धर्म के पक्के होते है अल्लाह के अलावा किसी और की और मुंह भी नहीं करते जब कोई अपना बाप नहीं बदल सकता अथवा अपने बाप कि जगह पर किसी और को नहीं देख सकता तो तुम साई को अपने भगवान की जगह पर देखकर क्यों दुखी या क्रोधित नहीं होते?
8 -अगर सनातन धर्मी हो तो सनातन धर्म में तो कहीं साई है ही नहीं। तो आप खुद को सनातन धर्मी कहलाना पसंद करोगे या धर्मनिरपेक्षी साई भक्त?
9 – आप खुद को राम या कृष्ण या शिव भक्त कहलाने में कम गौरव महसूस करते हैं क्या जो साई भक्त होने का बिल्ला टाँगे फिरते हैं? क्या राम और कृष्ण से प्रेम का क्षय हो गया है?
10 – ॐ साई राम ॐ हमेशा मंत्रों से पहले ही लगाया जाता है अथवा ईश्वर के नाम से पहले साई के नाम के पहले ॐ लगाने का अधिकार कहां से पाया? जय साई राम श्री में शक्ति माता निहित है श्री शक्तिरूपेण शब्द है  जो कि अक्सर भगवान जी के नाम के साथ संयुक्त किया जाता है तो जय श्री राम में से श्री तत्व को हटाकर साई लिख देने में तुम्हें गौरव महसूस होना चाहिए या शर्म आनी चाहिए?
ये जो फोटो है ऐसे फोटो आजकल चोराहों पर लगाकार भगवान का खुलेआम अपमान और हिन्दुओं को मूर्ख बनाया जा रहा है? मुस्लिम साई के चक्कर में नहीं पड़ते धर्म के पक्के है सिर्फ अल्लाह हिन्दू प्रजाति ही हमेशा मूर्ख क्यो बनती है। 
जय श्री राम! जय सनातन धर्म!!

गुरुवार, 10 जनवरी 2013

सरदार पटेल

आज फिर पटेल याद आ गये

डॉ विवेक आर्य








कासिम रिज़वी को ऑपरेशन पोलो के तहत गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया जहाँ वह 1957 तक सड़ता रहा। बाद में 1957 में वह माफ़ी मांग कर पाकिस्तान में शरणार्थी बनकर चला गया। 1947 से 1957 तक मजलिस पर प्रतिबन्ध रहा। इसी कासिम रिज़वी की मजलिस पार्टी को 1957 में अब्दुल वाहिद ओवैसी ने दोबारा से शुरू किया और वही अब्दुल वाहिद ओवैसी अकबरुद्दीन और असदुद्दीन का दादा था। 
`ओवैसी' नाम से चंद दिनों पहले तक शायद ही कोई हैदराबाद अथवा आंध्र प्रदेश के बाहर परिचित था। परन्तु आज सबको मालूम हो गया हैं कि ओवैसी के नाम से अकबरुद्दीन और असदुद्दीन दो भाई हैं जो मुस्लिम वोटों की खातिर इस देश के बहुसंख्यक हिंदुओं को सरेआम मिटाने की बात करते हैं जो हिन्दुओं के आराध्य प्रभु रामचन्द्र जी महाराज के विषय में अभद्र भाषा का प्रयोग करने से भी पीछे नहीं हटते हैं। पाठक सोच रहे होगे जिस अत्याचार की यह लोग बात कर रहे हैं वह कभी संभव ही नहीं हैं पर यह भी एक अटल सत्य है कि हिंदुओं का ‘इतिहास’ काफी कमज़ोर होता हैं। जी हाँ, मैं बात कर रहा हूँ 1947 से पहले के हैदराबाद स्टेट की जिस पर एक समय विश्व के सबसे अमीर आदमियों में से एक मतांध और संकीर्ण सोच वाला निज़ाम राज्य करता था। निज़ाम के राज्य में 95 प्रतिशत जनसँख्या हिन्दुओं की थी और मुसलमानों की संख्या केवल 5 प्रतिशत थी। उसके विपरीत राज्य की 95 प्रतिशत सरकारी नौकरियों पर मुसलमानों का कब्ज़ा था और केवल 5 प्रतिशत छोटी नौकरियों पर हिन्दुओं को अनुमति थी।
नेहरू-गांधी-पटेल
निज़ाम के राज्य में हिन्दुओं को किसी भी प्रकार से मुसलमान बनाने के लिए प्रेरित किया जाता था।  हिन्दू अपने त्यौहार बिना पुलिस की अनुमति के नहीं मना सकते थे। किसी भी मंदिर पर लाउड स्पीकर लगाने की अनुमति नहीं थी, किसी भी प्रकार का धार्मिक जुलूस निकालने की अनुमति नहीं थी क्यूंकि इससे पाँच वक्त के नमाज़ी मुसलमानों की नमाज़ में व्यवधान पड़ता था। हिन्दुओं को अखाड़े में कुश्ती तक लड़ने की अनुमति न थी। कारण स्पष्ट था की अगर हिन्दू बलशाली हो गए तो वे बल से इस अत्याचार का प्रतिरोध करेंगे। जो भी हिन्दू इस्लाम स्वीकार कर लेता तो उसे नौकरी/ छोकरी /जायदाद सब कुछ निज़ाम राज्य की और से दिया जाता था। तबलीगी का काम जोरों पर था और इस अत्याचार का विरोध करने वालों को पकड़ कर जेलों में ठूंस दिया जाता था जिनकी सज़ा एक अरबी पढ़ा हुआ क़ाज़ी शरियत के अनुसार सदा कुफ्र हरकत के रूप में करता था। जो भी कोई हिन्दू अख़बार अथवा साप्ताहिक पत्र के माध्यम से निज़ाम के अत्याचारों को हैदराबाद से बाहर अवगत कराने की कोशिश करता था तो उस पर छापा डाल कर उसकी प्रेस जब्त कर ली जाती, उसे जेल में डाल दिया जाता और मोटा हर्जाना वसूला जाना आम बात थी।
जब भारत की आबोहवा में पाकिस्तान का नाम लिया जाने लगा तो निज़ाम की मतान्धता में कई गुना की वृद्धि हुई और अपने अत्याचारों को मासूम प्रजा पर जिहादी तरीके से लागू करने के लिए उसने रजाकार के नाम से एक सेना बनाई जो हथियार लेकर गलियों में झुण्ड के झुण्ड बनाकर जिहादी नारे लगते हुए गश्त करने लगे। उनका मकसद केवल एक ही था। हिन्दू प्रजा पर दहशत के रूप में टूट पड़ना। इन रजाकारों का नेतृत्व कासिम रिज़वी नाम का एक मतान्ध मुसलमान कर रहा था। इन रजाकारों ने अनेक हिन्दुओं को बड़ी निर्दयता से हत्या की थी। हज़ारों अबलाओं का बलात्कार किया गया, हजारों निरपराध हिन्दू बच्चों को पकड़ कर सुन्नत तक कर दिया था । यहाँ तक की जनसँख्या का संतुलन बिगाड़ने के लिए बाहर से लाकर मुसलमानों को बसाया गया था।
आर्य समाज के हैदराबाद के प्रसिद्द नेता भाई श्यामलाल वकील की जेल में डालकर अमानवीय अत्याचार कर जहर द्वारा हत्या कर दी गयी। MIM - Majlis-e-Ittehād-ul Muslimīn (माजलिस-ए-इत्तेहाद-उल-मुसलमिन) की स्थापना 1927 में निज़ाम की सलाह पर उसके कुछ बाशिंदों ने करी थी जिसकी कमान बाद में कासिम रिज़वी के हाथ में आ गयी थी। आर्य समाज ने 1939 में इस हिंदुओ पर हो रहे अत्याचार के विरुद्ध अहिंसात्मक आन्दोलन किया। पूरे भारत से 7.5 हज़ार आर्य क्रांतिकारियों ने निज़ाम की जेलों को भर दिया जिससे की निज़ाम के राज्य में किसी अपराधी को जेल में रखने का स्थान न बचा। अहिंसा का मंत्र जपने वाले महात्मा गाँधी ने आर्यसमाज का खुलकर हैदराबाद सत्याग्रह करने पर विरोध किया जिसकी प्रतिक्रिया स्वरुप कांग्रेस का दफ्तर उसके सभी सदस्यों के त्याग पत्रों से भर गया तब जाकर गाँधी को मालूम हुआ की कांग्रेस के 85% सदस्य आर्य समाजी हैं और उन्होंने अपनी आलोचना को वापिस लिया। आर्यसमाज के इस सत्याग्रह में दो दर्जन के करीब सत्याग्रही शहीद हुए पर अंत में विजयश्री आर्यसमाज को ही मिली। निज़ाम जो दुनिया में अपने से बढ़कर किसी को भी नहीं समझता था उसे नीचा दिखा दिया गया। मजलिस ने आर्यसमाज का पुरजोर विरोध किया पर विजय अंत में सत्य की हुई। हिन्दुओं को उनके अधिकार मिले। पर आन्दोलन के बाद भी रजाकारों का अत्याचार न थमा।  
1947 तक आते आते निज़ाम ने पाकिस्तान से हैदराबाद रियासत को मिलाने की बात कह दी और एक 15 मील चोड़ा कॉरिडोर हैदराबाद को पाकिस्तान से जोड़ने के लिए माँगा। कासिम रिज़वी सरदार पटेल को धमकी देने की नीयत से दिल्ली आया और सरदार पटेल से बोला कि अगर निज़ाम की मांगों को न माना गया तो उसके राज्य में रह रहे 6 करोड़ हिंदुओं की खैर नहीं होगी। सरदार पटेल ने मुस्कुराते हुए रिज़वी को कहा कि  अगर हिंदुओ को कुछ भी हुआ तो निज़ाम और खुद कासिम रिज़वी अपने बच्चों की खैरियत मनाये। सरदार पटेल का कड़ा रुख देखकर रिज़वी वापिस हैदराबाद भाग गया।
अब्दुल वाहिद ओवैसी
नेहरु हैदराबाद के मामले को UNO में लेकर जाने की बात कर रहे थे जबकि सरदार पटेल हैदराबाद पर सैनिक कार्यवाही का मन बना चुके थे। रजाकारों द्वारा यह खबर उड़ाई जा रही थी की हजारों की संख्या में हथियार, गोला बारुद निज़ाम ने पाकिस्तान से भारत की फौजों से लड़ने के लिए मंगवाया हैं। सरदार पटेल अपने निश्चय पर अटल रहे क्यूंकि उन्हें मालूम था की अपने ही बच्चे पाकिस्तान की कितनी औकात हैं।  उन्होंने हैदराबाद को भारत में मिलाने के लिए जैसे ही कार्यवाही शुरू करी तो अधिकांश रजाकारों ने आत्म समर्पण कर दिया और कुछ मार डाले गये। दुनिया का सबसे घमंडी आदमी निज़ाम अपना-सा मुँह लेकर रह गया और समझोते के लिए सरदार पटेल की अगवानी करने स्वयं हवाई अड्डे पर पहुंचा। सरदार पटेल ने अपनी शर्तों पर निज़ाम से संधि करवाई। कासिम रिज़वी को ऑपरेशन पोलो के तहत गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया जहाँ वह 1957 तक सड़ता रहा। बाद में 1957 में वह माफ़ी मांग कर पाकिस्तान में शरणार्थी बनकर चला गया।
1947 से 1957 तक मजलिस पर प्रतिबन्ध रहा। इसी कासिम रिज़वी की मजलिस पार्टी को 1957 में अब्दुल वाहिद ओवैसी ने दोबारा से शुरू किया और वही अब्दुल वाहिद ओवैसी अकबरुद्दीन और असदुद्दीन का दादा था। पाठक अब यह आसानी से जान गए होगे की किस प्रकार इनकी पार्टी मजलिस ने पहले हिंदुयों पर अत्याचार किया उसके बाद पाकिस्तान के समर्थन में नारे लगाये, और अब भारत में जिहादी गतिविधियों और दंगे फसाद को फैलाने की इनकी मंशा हैं। इनका एक ही हल हैं की इन दोनों भाइयों को कासिम रिज़वी की तरह पकड़ कर या तो जेल में डाल देना चाहिए अथवा पाकिस्तान भेज देना चाहिए और इनकी पार्टी पर राष्ट्र द्रोही गतिविधियों के कारण प्रतिबन्ध लगा देना चाहिए। यह कार्य अगर कोई कर सकता हैं तो केवल सरदार पटेल कर सकते हैं और इसीलिए आज फिर पटेल याद आ गये।
साभार
link: http://agniveerfans.wordpress.com/2013/01/10/sardar-patel/
http://www.youtube.com/watch?feature=player_embedded&v=Dje382DaAag

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